
कभी सोचती हूँ कि काश दुनिया में कोई रंग ही न होते।
न गोरा न काला न भूरा
न गुलाबी न नीला। ...
कोई भेदभाव न होता
संकीर्ण मानसिकता न होती
समरंगी ये दुनिया होती। ....
आज पक्षपाती दूषित विचार
मानवता पर कर रहे हर रोज़ अत्याचार
मनोहर रंग-भरी दुनिया को मैला करते
अब कहाँ हम रंगों को पहचान पाएंगे?
सब द्वेष से ढका दिखाई देता है
कोई होता जो हमें सिखाता
इंद्रधनुष के जैसा बनना
विभिन्नता का सामंजस्य
विविधता की संगति
बहुरंगी मिलाप की सुंदरता
कभी सोचती हूँ कि काश ये दुनिया रंगहीन ही होती
गर एक दिन सब रंग खो जाएँ
शायद सब रंगों की महत्ता समझ जाएँ
बस एक दिन बिना रंगों की दुनिया की कल्पना करके देखो
नीले आसमान ,हरे पेड़ों और रंग-बिरंगे फूलों के बिना जी के देखो
अपने वर्ण का दम्भ भी मिटा के देखो
रंग हैं तो हम हैं
रंग ही जीवन की परिभाषा हैं
रंग ही जीवन का सार हैं। ....
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