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Sunday, January 15, 2017

दो कमरों का घर




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सब कहते हैं बड़ा मकान खरीद लो 
कब तक किराया भरोगे 
दो कमरे छोटे नहीं लगते क्या तुम्हे ?
बच्चों को भी जगह चाहिए। ... 
नया घर होगा, नई खुशियां आएंगी 
मैं सोच में पड़ जाती हूँ 

ये दो कमरों का मकान 
घर ही तो है 
मानती हूँ दीवारें थोड़ी पुरानी हो गयी हैं 
पर वो जो लकीरें तुम्हे चुभ रही हैं 
वो मेरे बच्चों की पहली लिखाई हैं 
वो पहली तस्वीरें, जो किताब में होतीं तो मैं संभाल भी लेती 
हर जगह ले जाती 
पर दीवारें नहीं उठा सकती 
सोचती हूँ कुछ पल और जी लूँ उन्हें 
धुंधली हो जाएंगी अपने आप जब 
तब नया घर ले लूंगी। 

तुम कहते हो जगह चाहिए 
शायद देखा नहीं तुमने 
साथ बैठे कितने अभिन्न हो जाते हैं हम यहां 
साँसों का संगीत तक सुनाई देता है..... 
थोड़ा रुको 
जब कदम बढ़ेंगे महत्वाकांक्षाओं के साथ 
अपनी जगह भी खुद बना लेंगे 
तब तक जी लेने दो यह करीबी 
हर किसी को नसीब नहीं होती 

दो कमरों का मकान है 
यादों से सजा 
भावनाओं से भरा 
थोड़ा बिखरा सही 
थोड़ा मैला सही 
पर खुशियां भी सजी यहीं हैं 
आंसू भी थमे यहीं हैं 
तुम्हारे लिए ईंट और पत्थर की तंग दीवारें हैं 
पर मेरे लिए यही घर है 
मेरे दो कमरों का मकान। .... 


Linking to #MondayMusings at Everyday Gyaan