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Saturday, January 28, 2017

नानी का संदूक

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खोला नानी का संदूक
रंग-बिरंगे ऊन के गोले की  तरह
सिमटी स्मृतियों के धागों ने मुझे बाँध लिया

निकली सफ़ेद रंग की क्रोशिए की शाल
और बिखर गयी यादों की गर्मी
और खेत में लहराते सरसों के फूलों सी
वो पीली दुशाला मन को गुदगुदा गयी
एक जानी-पहचानी महक थी संदूक की
वो गंध जो कीड़ों को संदूक में रहने नहीं देती
छोटी-छोटी सफ़ेद गोलियां
कोने में लुढ़की
कपड़ों में दुबकी
नानी के संदूक में

वो तस्वीरों का गुच्छा

जैसे फूलों का गुलदस्ता
जताता इस बात को कि
कभी मम्मी भी छोटी थीं
और नानी भी मम्मी थीं

सिल्क की साड़ियां

ज़री सजा लहँगा
अखबारों के बीच सहेजा-संभाला
शादी का जोड़ा
अपना ही संगीत बुनती
लंबी सफ़ेद सलाइयां
तांबे के शोर मचाते
कुछ नटखट बर्तन
चांदी की चम्मच
चांदी का झुनझुना
मात्रियोश्का डॉल का एक सेट
कोई टूटा खिलौना
और छठी के छोटे कपड़े
जब दिया जला के रात भर जागी होंगी नानी
एक मीठे कल की आस में

नानी का संदूक

यादों का पिटारा
खट्टे-मीठे पलों का बक्सा। ...

बीते कल का प्रतीक
प्राचीन और भारी
आज के हलके सूटकेस
का मज़बूत पूर्वज
स्टोररूम में सुसज्जित
या किसी की कॉफ़ी-टेबल का विकल्प
विमानों और समुद्री जहाज़ों में घूमा
स्मर्णिकाओं का धारक
कभी नोट्रेडम के देश में
कभी ब्रुसेल्स के ताँबे के बुत के रू-ब-रू
कभी पानी पर स्थित इटली के शहर वेनिस में
कभी रंगून के पवित्र पगोडा की भूमि पर
साम्यवादी नीतियों का साक्षी
कभी बिग बेन के घूंजते घंटों की आवाज़ सुनता जो शायद ये कहते हैं 
कि समय ठहरता नहीं तो तुम क्यों रुके हो - चलते जाओ। ... 
उसकी बात मान शायद 
इतिहास के पन्नों से टहलता टहलता
आज आ गया इन शब्दों को अर्थपूर्ण करने -
मेरी कविता का प्रसंग....
मेरी कल्पना का प्रतिनिधि
नानी का संदूक। .....


इस कविता में जिन जगहों का उल्लेख मैंने किया है, नानी ने वहां पर कुछ वर्ष व्यतीत किये थे - यूरोप के विभिन्न देशों में रहने की वजह मेरे नानाजी का काम था। वो  विदेशी विभाग में कार्यरत थे।


Linking to #WYHO - Write Your Heart Out The Artist's Way being hosted by Corinne at Everyday Gyaan. While it is not a free write exercise, I have tried to respond to the prompt - And we found _________ in a trunk in the attic…….

Wednesday, November 9, 2016

#DearZindagi.....

Indian Bloggers

Dear Zindagi,

कहाँ से शुरू करूं ? Ruth Ozeki की किताब A Tale for the Time Being पढ़ रही हूँ।  कहानी में Nao , जो प्रमुख पात्र है, इस ही सवाल का जवाब सोच रही है और उसको जवाब मिलता है कि जहाँ हो, वहीँ से शुरू करो।  बात अच्छी लगी तो मैंने सोचा की क्यों न ये करके देखा जाए।

तो नवम्बर की मीठी ठण्ड में सुबह ५ बजे उठ कर नाश्ता और lunch-box तैयार करती हूँ।  सारा काम ख़त्म  होते ही अदरक वाली कड़क चाय और bread के दो toast बना कर बैठ जाती हूँ, तुम्हे ये letter  लिखने के लिए।  India में होती तो मम्मी और भाभी भी चाय के साथ कुछ गप-शप लगातीं और चाय पीने का मज़ा दोगुना हो जाता।  पर New Jersey के शहर Edison के एक apartment में बच्चों के उठने से पहले ये चिठ्ठी लिखने का मज़ा भी अलग लग रहा है।

बाहर बिलकुल अँधेरा है। खिड़की के blinds हटा के देखती हूँ तो आस-पास बस छोटी-छोटी टिमटिमाती lights नज़र आती हैं।  न कोई चिड़िया अपने घोंसले से बाहर आयी है और न ही कोई इंसान।  Blinds बंद करते हुए ख्याल आता है मम्मी की kitchen की खिड़की का।  पिछली बार जब India गयी थी तो वो खिड़की तो जैसे मेरी दोस्त ही बन गयी थी। जब भी बाहर देखो तो, Dear Zindagi , तुम अनोखे अंदाज़ में मुस्कुराती इतराती नज़र आती थीं। कोई गाय अपने झुण्ड के साथ जाती दिखती थी, तो कोई scooter वाला ऑफिस जाने की जल्दी में तेज़ रफ़्तार से निकलता नज़र आता था।  कहीं स्कूल uniform में बच्चे bag और पानी की bottle उठाये बस का इंतज़ार करते दिखाई देते थे।

खिड़की के बाहर, सड़क के किनारे एक पेड़ था। मम्मी ने माली से पूछ के बताया कि वो kigelia का पेड़ है - हिंदी में बलम -खीरा कहते हैं। न जाने मैं कितने साल उस पेड़ के नीचे खड़ी हो के अपनी स्कूल बस की wait किया करती थी।  उसी पेड़ के नीचे पापा ने एक चबूतरा बनवाने की सोची।  गर्मी के दिन बहुत थकान वाले होते हैं India में। पापा ने सोचा की बहुत चलती सड़क है , तो क्यों ने राहगीरों के लिए एक पानी की प्याऊ बनाई जाये। पक्का चबूतरा बनवाया गया।  मिटटी के मटके रखे गए - आह क्या खुशबू होती है मिटटी के मटकों के पानी की ! आते-जाते प्यासे राही जब वहाँ रुक कर पानी पीते तो लगता था कि प्याऊ का होना जैसे सार्थक हो गया।  पर ऐसा बहुत देर तक नहीं चला।  जानते हैं क्यों - क्योंकि शायद पानी की प्यास पूरी करने से ज़्यादा ज़रूरी कुछ और लोगों की अनजान पर महत्वपूर्ण ज़रूरतें थीं जो मटके या मटके के ढक्कन को चुरा कर बेचने से पूरी हो पाती थीं।

खैर, प्याऊ का अस्तित्व बनाते मटके गायब होते गए।  हार कर मटके रखना छोड़ दिया।  बेचारा चबूतरा तनहा हो गया।  एक सुबह खिड़की से देखा कि zindagi  एक नए रूप में चबूतरे पर सजी थी।  प्याऊ की जगह चाय का खोका खड़ा था।  सर्दी हो या गर्मी, चाय पीने वाले मौसम नहीं देखते।  धीरे-धीरे जमघट बढ़ता गया और चाय वाला तुम्हे, Dear Zindagi, एक बार फिर से ख़ुशी से जीने लगा।

कुछ दिन बीते। जाने चाय वाले की चाय ख़त्म हुई या फिर उसको zindagi ने कुछ नई राह दिखा दी, वो भी चबूतरा छोड़ के चला गया। पेड़ की हरियाली चबूतरे के खालीपन को कुछ दिन तक भरती रही।  कभी दोपहर में खिड़की से बाहर नज़र जाती थी तो दिखता था कि दो बंधु पेड़ से कुछ तोड़ रहे हैं।  बलम-खीरे का उपयोग जोड़ों के दर्द, गठिया के उपचार आदि के लिए किया जाता है। शायद घर के किसी वृद्ध के दर्द दूर करने के लिए बंधु पेड़ पर चढ़े होंगे।

एक दिन देखा एक सफ़ेद गाड़ी से एक आदमी बाहर निकल कर चबूतरे पर कुछ कपड़े रख रहा है।  सस्ती टी-शर्ट्स, जो न सिर्फ कीमत में पर देखने में भी सस्ती लगती थीं , उनका खरीददार कौन होगा, ये सवाल मन में उठा।  पर जवाब जल्दी ही मिल गया जब सुबह, दोपहर और शाम, कई दिनों तक, चबूतरे पर लोगों की भीड़ लगी रहती।  साइकिल सवार हो या बड़ी गाड़ी चलाने वाले अंकल, सबको उन टी-शर्ट्स में कुछ तो बात लगती थी।  समय बीता और zindagi का ये रंग भी किसी और गली-कूचे को रंगीन करने निकल गया। 

पर चबूतरा तो मानो सबको मोहित करता था।  कुल्फी वाले भैया ने वहां खूब कुल्फी बेचीं।  लोगों को गर्मी से राहत मिलती और भैया की जेब थोड़ी गर्म हो जाती। 

हम खिड़की के इस पार  खड़े यही सोचते थे कि अब ये जाएगा तो कौन आएगा। जैसे कोई मंच  हो मानो , जिसमें एक पात्र अपनी भूमिका निभा के जाता और फिर दूसरा आ कर उसकी जगह ले लेता। 

zindagi आगे चलती रही।  पर चलते चलते कभी पैर थके तो कभी जूते फटे।  चबूतरा सब देखता रहा। जहाँ कभी कपड़े , कभी पानी और कभी चाय या कुल्फी थी, आज वहां जूते रखे गए।  लोग आये।  जूते पहन कर देखे।  किसी को भाए तो लिए नहीं तो आगे बढ़ गए घड़ी की उस सूईं की तरह जो किसी का इंतज़ार नहीं करती।  

Dear Zindagi , कितने रंग हैं तुम्हारे!  तुम्हे जीने के लिए इंसान क्या नहीं करता। क्या हो तुम - एक उम्मीद , आगे बढ़ता एक कदम, एक छलावा, या एक भटके हुए राही की आखिरी मंज़िल ? उस दिन जब वो शराबी, जिसे किसी ने पागल कहा और किसी ने तिरस्कारा, क्या वो तुम्हारे आँचल में छुपा तुमसे कुछ सवाल नहीं पूछ रहा था? चबूतरा शायद उसको एक पालने के जैसा लगा होगा तो वो नशे में चूर हो वहां सो गया।  kigelia के पेड़ के तले कुछ गहरे सपनों में खो गया।  सब ने दूर से देखा और कहा कि शायद कोई पागल है, नहीं तो कौन भला ऐसे सो जाएगा।  कुछ पल बीते, कुछ घंटे और फिर पूरी रात।  शायद तुमने उसको बहुत थका दिया होगा zindagi .... तभी तो इतनी देर तक सुषुप्त रहा। सबने सोचा की शायद मर गया।  नींद में चबूतरे से नीचे सड़क पे भी लुड़क गया।  भीड़ जमा हुई।  सबकी साँसें थमी थीं कि जाने कौन है , क्या हुआ है।  कोई हमदर्दी से पास नहीं गया शायद, पर उत्सुकता ज़रूर उसके पास खींच ले गयी - सब जानना  चाहते थे कि ज़िन्दगी ने उसका साथ छोड़ा या नहीं।  

कुछ पल बीते।  साँसें चल रहीं थीं।  चेतना लौटी और शराबी/पागल अपनी मंज़िल की ओर बढ़ गया।  देखने वालों को कहानी मिली सुनाने के लिए और देखने के लिए मिला zindagi का एक और रंग। चबूतरा चुप-चाप एक मज़बूत मंच बन डटा रहा, जैसे कह रहा हो कि कोई भी मौसम क्यों न हो , मैं zindagi को बुलाता रहूँगा , कोई गीत गाता रहूँगा। धुन कभी दर्द देगी तो कभी हंसाएगी, पर ज़िन्दगी यूँ ही चलती चली जाएगी। 

ये सब लिखते हुए न जाने कितने पल बीत गए।  लगा कि मैं  फिर वहीं उस खिड़की के परदे खोल रही हूँ।  पर परदे उन यादों के खोल रही थी जिन्होंने मेरी ज़िन्दगी को सजाया है।  कुछ खट्टी यादें, कुछ मीठी यादें -  नम आँखों से टपकती यादें, मुस्कुराते होठों से छलकती यादें।  कहानी तो चबूतरे की लिखी पर स्कूल से सफर करती हुई आज के पल में आ के ठहर गयी।  कितना कुछ खोया इस सफर में - पापा की हंसी , भाई की शरारतें, बेपरवाह बचपन।  और कितना कुछ पाया - भाभी के रूप में एक पक्की सहेली, मम्मी की निकटता, बच्चों की मासूम शैतानियां। खेल खेलना खूब जानती हो तुम zindagi , कुछ लेती हो, कुछ दे जाती हो।  

क्या शिकायत करूं तुमसे.... मालूम नहीं।
सोचती हूँ बस चलती रहूँ। 
मंज़िल कहाँ है, क्या पता।  पर ये जानना शायद ज़रूरी नहीं। कुछ रास्ते छुपे रहें तो ही अच्छा है।  न जाने किस मोड़ पे कौन सी  खिखिलाहट रू-ब -रू हो जाए।  रही बात आंसूओं की, तो उनसे बातें करना तो तुमने सिखा ही दिया है। 

स्नेह सहित 
zindagi के मंच की एक पात्र 


“I am writing a letter to life for the #DearZindagi activity at BlogAdda







Saturday, July 23, 2016

पापा की बेटी

बचपन से ही पापा की दुलारी बेटी थी।  प्रतिदिन सुबह पापा को उठ कर कचहरी के लिए तैयार होता देखती।  काला कोट न जाने कैसे सम्मोहित सा कर देता।  काले चमचमाते जूते टक-टक करते अपना संगीत सुनाते और मुझे मोह लेते।  जब तक गाड़ी आँखों से ओझल न हो जाती , मैं टकटकी लगाए दरवाज़े या खिड़की पर खड़ी रहती थी। जबसे स्मृतियां बनीं , जबसे चेतना जागी , मुझे बस एक बात याद है - पापा की तरह मुझे भी वकील बनना था ।  

सुबह-शाम सपने देखती कि मैं भी काला कोट पहन कचहरी जा रही हूँ। अदालत में अपनी दलीलों से सबको हरा रही हूँ।  कि पापा की तरह समाज में मेरी भी पूछ है , रुतबा है। 

आज जब सोचती हूँ तो लगता है कि वकील बनने से ज़्यादा मैं पापा की छवि चाहती थी।  पापा की लुभावनी छवि - मुस्कुराता चेहरा, बेबाक हंसी, निडर व्यक्तित्व , सकारात्मक दृष्टिकोण।  आखिर वही  तो था उनकी सफलता का कारण।  और मैं बचपन  की मासूम अनभिज्ञता में दोनों को एक समझ बैठी। 

 रातों-रात नहीं बना था पापा का  रुतबा।  न जाने कितनी रातें पापा ने जाग कर गुजारीं होंगी।  न जाने कितनी किताबें जो पापा के दफ्तर की शोभा में चार चाँद लगाती थीं, पापा ने पढ़ी होंगी।  और न जाने कितनी बार नाकामयाबी की ठोकर भी खायी होगी।  मैं तो बच्ची थी।  मुझे सिर्फ पापा की खनकती हंसी सुनाई देती थी।  मुझे बस मम्मी के स्नेहित स्पर्श हर्षाता था।  मुझे बस भाई के संग मस्ती भाती थी। 

पापा कभी कचहरी के किस्से घर पर नहीं लाते थे पर यह जग-विदित था कि पापा कि अपनी साख थी।  पर पापा ने बहुत संघर्ष किया था यहाँ तक पहुँचने के लिए।  और मम्मी ने उनका पूरा साथ दिया था।  मम्मी बताती हैं कि पापा ने वकालत शुरू ही की थी और मेरे दादाजी का निधन हो गया था।  पर पापा ने हिम्मत नहीं हारी।  दिन-रात मेहनत करते थे।  किराए के घर के पैसे चुकाने के लिए गुल्लक में पैसे रखते।  घर में गैस का पहला सिलिंडर मम्मी की आमदनी से आया था।  मम्मी कॉलेज में पढ़ाती थीं।  पापा के पास आने-जाने का साधन भी नहीं था तो किसी और के साथ जाया करते थे।  एक दिन उसने मना कर दिया।  पापा का मन आहत हुआ और पापा ने स्कूटर खरीदा। मम्मी और पापा जैसे उस दुपहिए वाहन के दो पहिए थे।  एक-दुसरे का मज़बूत सहारा।  एक के बिना दूसरा अधूरा। 

कहते हैं न कि सबको हीरे की बस चमक दिखाई देती है।  सब भूल जाते हैं कि वह कितना तपा है उस चमक के लिए।  ऐसा ही सफलता के साथ होता है।  सबको चका -चौंध दिखती है।  संघर्ष कोई देख नहीं पाता।  

बात सपनों की हो रही थी।  मैं धीरे-धीरे बड़ी हुई।  पर सपना अभी भी वही आँखों में बसा था।  वकील बन जाऊं , बस वकील - पापा की तरह।  लेकिन समाज में बहुत रुकावटें थीं।  या कहूं कि बहुत त्रुटियां थीं।  मम्मी को, भाई को डर था समाज की कुदृष्टि से मुझे बचाना चाहते थे इसीलिए मेरा सपना उनकी उलझन बढ़ाता था।  फिर भी उन्होंने मेरा साथ दिया।  लॉ कॉलेज की प्रवेश-परीक्षा भी दिलवाई।  साथ साथ एक और सपना भी पनप रहा था - मेरी मम्मी का सपना मुझे लिटरेचर यानि साहित्य पढ़ाने का।  उन्हें बचपन से ही इंग्लिश लिटरेचर रोचक लगता था पर उस समय उनके कॉलेज में साहित्य की डिग्री उपलब्ध नहीं थी।  पर मम्मी अपना सपना थोप नहीं रहीं थीं मुझे पे।  बस मुझे एक विकल्प दिया था की अगर लॉ कॉलेज में दाखिल नहीं हो पायी तो लिटरेचर पढ़ लेना।  किताबें तो जैसे मेरे जीने का सहारा थीं।  बहुत किताबें पढ़ती थी मैं - पापा अक्सर दिल्ली से लाया करते थे मेरे लिए।  तो बस, इंग्लिश होनर्स की भी प्रवेश परीक्षा दे डाली।  

अब किस्मत ने कहा की सुनो मुझे भी तो कुछ करने दो।  तो हुआ यूँ कि परीक्षा के परिणाम पहले लिटरेचर के आ गए।  आखिरी तिथि भी नज़दीक थी दाखिला लेने की।  समय कम था।  मन में उलझन भी थी मम्मी के।  पापा ने मुझे स्वतंत्र  चुनाव के लिए प्रेरित किया था।  पर समय की कमी मुझ पर हावी हो गयी।  और मैंने लिटरेचर में दाखिला लिया।  कुछ  दिन बाद लॉ का परिणाम घोषित हुआ और मुझे जीवन भर के लिए एक अफ़सोस  दे गया कि काश मैं थोड़ा रुकी होती तो आज मैं वकील होती। 

पर लिटरेचर ने बहुत सम्भाला मुझे।  अच्छे-बुरे समय में  किताबों ने बहुत ज्ञान दिया।  समाज की जटिलता , स्वभावों की पेचीदगी, विचारों की उलझन, निर्णयों की विवशता - कितना कुछ था किताबों में।  आज दुःख नहीं कि सपना पूरा नहीं कर पायी।  आज ख़ुशी है कि पापा कि  सकारत्मकता मुझ में  सम्मिलित हुई।  वो खनकती हंसी मेरी न हो सकी पर मेरे जीवन को पल-पल अलंकृत  करती रही।  मुझे कहती रही कि अफ़सोस मत कर, बस ज़िन्दगी जी ले। 

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This post is a part of Write Over the Weekend, an initiative for Indian Bloggers by BlogAdda.’